Thursday, 22 December 2011

दिल से.......!

हर ख़ुशी दाख़िल हो अब दामन में मेरे यार के
कोई ग़म शामिल न हो जीवन में मेरे यार के
ऐ खुदा मेरे लिए तुमने चुने काटें सही
पर हसीं गुलशन बिछा आँगन में मेरे यार के

Saturday, 3 December 2011

मन से रहेंगे साथ सदा......

कभी तुम्हें आँखों  के बिलकुल सामने मैं पाता हूँ | 
और कभी मैं मीलों तुमसे दूर चला आता हूँ |
कभी लगे तू नदिया कोई और समंदर मैं हूँ | 
कभी लगे तू नभ मैं बादल, तुझ में समा जाता हूँ | 


कभी तुझे मैं बूझ न पाऊँ ऐसी तू है पहेली | 
और कभी प्रतिबिम्ब मेरा हो ऐसी तू है सहेली |
कितना भी तू रूठ ले मुझ से दूर नहीं जाना है | 
मन से रहेंगे साथ सदा; हाँ, मैंने क़सम है ले ली |

Wednesday, 14 September 2011

ईश्वर और सत्य

ईश्वर ही सत्य है मेरे लिए
सत्य को ईश्वर मानती है वो
वो सत्य है मेरा
मैं ईश्वर उसके लिए !

शब्द ही पहचान मेरी

मैं सोचता हूँ क्योंकि मै इन्सान हूँ |
मैं सोचता हूँ इसीलिए मैं हूँ |
मैं कहता हूँ क्योंकि मैं सोचता हूँ |
और मेरे कहे हुए शब्द रहेंगे साथ तुम्हारे....
जब मेरी पलकें झपकने से इन्कार करें |

गम की स्याही

मुझे अपने सारे दुख दे दो |
जीवन की सारी व्यथाएं, पीडाएं, वेदनाएं दे दो मुझे |
मेरे कलम की स्याही सूख गयी है |

Sunday, 11 September 2011

देखा है मैंने


देखा है मैंने
साथी बादलों से घिरे
चाँद को
चोरी से
मेरी तरफ देख
मुस्कुराते हुए !
हाँ; देखा है मैंने |


और ये जानने के बाद
की मैं भी देख रहा हूँ उसे
साथी बादलों की आड़ में
झट से छुप जाने वाले
चाँद को भी तो देखा है मैंने;
हाँ देखा है !

Friday, 12 August 2011

बन गगन !

कितने घन आतें गगन में
रहतें हैं ख़ुद में मगन
और चलें जातें गगन से
फिर अकेला  है गगन
.....
ऐ मेरे मन,
बन न घन
बनना है तो बन गगन !

Monday, 11 July 2011

छूना नहीं

कभी ग़लती से भी छूना नहीं नज्मों को मेरी |
इन्हें बस दूर से देखो; नहीं तो जल ही जाओगे!

Thursday, 7 July 2011

कोई अर्थ है अस्तित्व का?

शब्द चारों ओर मंडरा रहें 
अर्थ की तलाश में व्यर्थ ही |
व्यक्त होने की आस लिए 
शब्दों की गूढ़ तलाश में 
अस्वस्थ मन से भटक रहें अर्थ भी |
क्या करें?
क्या बोलें?
केवल भय है मौन का 
क्या इसीलिए ये बोल हैं?
केवल न होने की कल्पना है भीषण 
क्या इसीलिए है होने का प्रयोजन ?
कुछ भी ना करना यह भी तो होता है कुछ करना 
सिर्फ होना; चलों इसी को कहते हैं जीना 
हमारे तथाकथित 'करने' का उपहास 
करता होगा ही 'वह' भी 
पर सोचें भी तो क्यों?
आखिर 'वह' भी ऐसा क्या करता है 
केवल 'होने' के अलावा ? 

Friday, 1 July 2011

काफ़िर ही सही

बैठा था चिंतन में डूबा 
नदिया के तट पे अकेला
हाँ... अकेला ही शायद!
तभी अचानक नजरें उठीं ऊपर 
उस अनादि अनंत आसमान में
देख गगन में होती अविरत 
एक अनोखी नीलधवल हलचल 
लगा 
मानो बूढ़े खुदा के बाल लहरा रहें हों...
काफ़िर ही सही 
पर ख़याल इतना भी बुरा नहीं 

Thursday, 23 June 2011

चलो चलें इस कठिन सफ़र पे


चलो चलें इस कठिन सफ़र पे
तुम और मै हम दोनों केवल
और न कोई  आने पाए
सताने वाला
मिटाने वाला
मंजिल से भटकाने  वाला


चलो चलें उन शब्दों के अर्थों को ढूंढें
जिन से थक कर ऊब गयी तुम
इस सुन्दर पर कठिन सफ़र से
आहत गम  में डूब गयी तुम


चलो चलें उस पथ से जाएँ
जो न कभी तुमने अपनाया
मै आगे तुम पीछे चल दो
मैंने किसी को ना भटकाया


जो विपदाएं पथ में आएँ
मै सहता हूँ साथ रहो तुम
तुम पे कोई आंच ना आए
वादा है विश्वास करो तुम


है विश्वास मुझे स्वयं पे
उससे भी ज्यादा है तुम पे
मंजिल को पा लेंगे दोनों
अर्थों को समझेंगे दोनों


जब लौटें इस कठिन सफ़र से
थके नहीं खुश्मंद ही होंगे
शब्द ना होंगे गूढ़ कहीं भी
दुख नहीं; आनंद ही देंगे


आज खड़ा तेरे दर पे मै हूँ
द्वार तेरा ये बंद है कब से
अब तो मेरा साथ निभा दे
दूर चलो हम चल दें सब से

Thursday, 9 June 2011

जीवन में तेरे मै आया हूँ

शब्दोंसे परे भावोंसे भरे कुछ ऐसे क्षण मैं लाया हूँ 
जीवन में तेरे मै आया हूँ
तू मान इसे संजोग सही 
या ईश्वर का संकेत कोई 
तू पूर्ण कहाँ, मै पूर्ण नहीं 
जो कुछ भी अधूरा कर दूं पूरा सोच यही ललचाया हूँ
जीवन में तेरे मै आया हूँ
तेरे चित्र बने, मै रंग भरूँ
तू काव्य लिखे मै शब्द बनूँ 
तेरे गीत सजें और सुर मै चुनूं 
साँसों की तरह तू मुझ में बसी, नसनस में तेरी मै समाया हूँ 
जीवन में तेरे मै आया हूँ 
मै दुःख में तेरे नयनों से बहूँ
और खुशियाँ बन होटों पे रहूँ 
तेरे संग विपदाएं मै भी सहूँ
छाया की तरह मै तुझ से जुड़ा तन मन पे तेरे मै ही छाया हूँ 
जीवन में तेरे मै आया हूँ 
शब्दोंसे परे भावोंसे भरे कुछ ऐसे क्षण मै लाया हूँ 
जीवन में तेरे मै आया हूँ