शब्दोंसे परे भावोंसे भरे
Thursday, 3 August 2017
बस यूँही
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बस यूँही
देखा है मैंने
देखा है मैंने साथी बादलों से घिरे चाँद को चोरी से मेरी तरफ देख मुस्कुराते हुए ! हाँ; देखा है मैंने | और ये जानने के बाद की मैं भ...
कोई अर्थ है अस्तित्व का?
शब्द चारों ओर मंडरा रहें अर्थ की तलाश में व्यर्थ ही | व्यक्त होने की आस लिए शब्दों की गूढ़ तलाश में अस्वस्थ मन से भटक रहें अर्थ भी | क्य...
काफ़िर ही सही
बैठा था चिंतन में डूबा नदिया के तट पे अकेला हाँ... अकेला ही शायद! तभी अचानक नजरें उठीं ऊपर उस अनादि अनंत आसमान में देख गगन में होती अविरत...
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