शब्दोंसे परे भावोंसे भरे
Sunday, 16 November 2014
नज़्म जूठी
मेरी नज़्म …
जो आई तुम्हारे लबों पे आज सुबह
सोचा चख लूँ ख़ुद
रात की फुरसत में...
कहते हैं …
जूठे से प्यार बढ़ता है !
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बस यूँही
देखा है मैंने
देखा है मैंने साथी बादलों से घिरे चाँद को चोरी से मेरी तरफ देख मुस्कुराते हुए ! हाँ; देखा है मैंने | और ये जानने के बाद की मैं भ...
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काफ़िर ही सही
बैठा था चिंतन में डूबा नदिया के तट पे अकेला हाँ... अकेला ही शायद! तभी अचानक नजरें उठीं ऊपर उस अनादि अनंत आसमान में देख गगन में होती अविरत...