Friday, 12 August 2011

बन गगन !

कितने घन आतें गगन में
रहतें हैं ख़ुद में मगन
और चलें जातें गगन से
फिर अकेला  है गगन
.....
ऐ मेरे मन,
बन न घन
बनना है तो बन गगन !