शब्दोंसे परे भावोंसे भरे
Friday, 12 August 2011
बन गगन !
कितने घन आतें गगन में
रहतें हैं ख़ुद में मगन
और चलें जातें गगन से
फिर अकेला है गगन
.....
ऐ मेरे मन,
बन न घन
बनना है तो बन गगन !
Monday, 11 July 2011
छूना नहीं
कभी ग़लती से भी छूना नहीं नज्मों को मेरी |
इन्हें बस दूर से देखो; नहीं तो जल ही जाओगे!
Thursday, 7 July 2011
कोई अर्थ है अस्तित्व का?
शब्द चारों ओर मंडरा रहें
अर्थ की तलाश में व्यर्थ ही |
व्यक्त होने की आस लिए
शब्दों की गूढ़ तलाश में
अस्वस्थ मन से भटक रहें अर्थ भी |
क्या करें?
क्या बोलें?
केवल भय है मौन का
क्या इसीलिए ये बोल हैं?
केवल न होने की कल्पना है भीषण
क्या इसीलिए है होने का प्रयोजन ?
कुछ भी ना करना यह भी तो होता है कुछ करना
सिर्फ होना; चलों इसी को कहते हैं जीना
हमारे तथाकथित 'करने' का उपहास
करता होगा ही 'वह' भी
पर सोचें भी तो क्यों?
आखिर 'वह' भी ऐसा क्या करता है
केवल 'होने' के अलावा ?
Friday, 1 July 2011
काफ़िर ही सही
बैठा था चिंतन में डूबा
नदिया के तट पे अकेला
हाँ... अकेला ही शायद!
तभी अचानक नजरें उठीं ऊपर
उस अनादि अनंत आसमान में
देख गगन में होती अविरत
एक अनोखी नीलधवल हलचल
लगा
मानो बूढ़े खुदा के बाल लहरा रहें हों...
काफ़िर ही सही
पर ख़याल इतना भी बुरा नहीं
Thursday, 23 June 2011
चलो चलें इस कठिन सफ़र पे
चलो चलें इस कठिन सफ़र पे
तुम और मै हम दोनों केवल
और न कोई आने पाए
सताने वाला
मिटाने वाला
मंजिल से भटकाने वाला
चलो चलें उन शब्दों के अर्थों को ढूंढें
जिन से थक कर ऊब गयी तुम
इस सुन्दर पर कठिन सफ़र से
आहत गम में डूब गयी तुम
चलो चलें उस पथ से जाएँ
जो न कभी तुमने अपनाया
मै आगे तुम पीछे चल दो
मैंने किसी को ना भटकाया
जो विपदाएं पथ में आएँ
मै सहता हूँ साथ रहो तुम
तुम पे कोई आंच ना आए
वादा है विश्वास करो तुम
है विश्वास मुझे स्वयं पे
उससे भी ज्यादा है तुम पे
मंजिल को पा लेंगे दोनों
अर्थों को समझेंगे दोनों
जब लौटें इस कठिन सफ़र से
थके नहीं खुश्मंद ही होंगे
शब्द ना होंगे गूढ़ कहीं भी
दुख नहीं; आनंद ही देंगे
आज खड़ा तेरे दर पे मै हूँ
द्वार तेरा ये बंद है कब से
अब तो मेरा साथ निभा दे
दूर चलो हम चल दें सब से
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देखा है मैंने
देखा है मैंने साथी बादलों से घिरे चाँद को चोरी से मेरी तरफ देख मुस्कुराते हुए ! हाँ; देखा है मैंने | और ये जानने के बाद की मैं भ...
काफ़िर ही सही
बैठा था चिंतन में डूबा नदिया के तट पे अकेला हाँ... अकेला ही शायद! तभी अचानक नजरें उठीं ऊपर उस अनादि अनंत आसमान में देख गगन में होती अविरत...
पलकों के तले
ख़्वाबों को हक़ीक़त का जामा हर बार नहीं पहनाया जाता कुछ ख़्वाब सिर्फ पलकों के तले महफूज़ रहते हैं पलकें खुली नहीं की पिघल गए हमेशा के लि...