Friday, 5 February 2016

नज़राना

तुम्हें देने के लिए चाँद-तारे तो नहीं मेरे पास। ...
चंद मेरी ये नज़्में हैं, चाहो तो नज़र कर दूँ ?

Wednesday, 3 February 2016

ये पाया हमने ?

आज तिरंगे को फिर से फ़हराया हमने
वही सिलसिला सालों का दोहराया हमने

बिना अर्थ को जाने, आशय को पहचाने
आज पुनः उस राष्ट्रगान को गाया हमने 

राष्ट्रप्रेम की वही प्रतिज्ञा फिर से रट के
झूठे शब्दों का अम्बार लगाया हमने

भाषण भी नेता का था जाना पहचाना
बड़े ध्यान से सुना मगर, दिखाया हमने

कौन भगत और कौन महात्मा किसे पड़ी थी?
नारा 'जय जय' का जम के लगाया हमने

सीमा पर जो ख़ून बहा है उसे याद कर
कुछ पल का अफ़सोस पुनः जताया हमने

चर्चा में सब अधिकारों पर खुल कर बोले
कर्तव्यों का मुद्दा कहाँ उठाया हमने?

'छुट्टी का दिन' यही आज की विशेषता है
राष्ट्र के लिए कहाँ इसे मनाया हमने ?

राष्ट्रवंदना एक दिखावा मात्र रह गयी
इतना कुछ खोके, ये पाया हमने ?

Wednesday, 20 January 2016

तू बन के रात...

तू बन के रात, आ जा अभी मेरे सिरहाने…
न जाने कितनी और हैं बातेँ, जो दिनभर तुमसे कही नहीं !

Monday, 28 December 2015

ख़ुद से वफ़ादारी...

कभी ख़ुद से भी बना कर देख लो ज़रा सी दूरियाँ
हमेशा ख़ुद की ख़ुद से वफ़ादारी ज़रूरी नहीं होती !

Friday, 25 December 2015

मेरी नाजुक नज़्में

चाँद को तराश कर बड़ी मेहनत से
एक क़लम बनाई है मैंने
और जला कर तारों को
बनाई है ये सियाही
सोचता हूँ के कुछ नज़्में लिख के जाऊँ
रात के कागज़ पे आज!
तुम बस इतना करना कि अपनी आँखों की अलमारी जल्दी से खोल कर 
उठा कर इन सारी नज़्मों को
बंद कर लेना उस अलमारी में
महफूज़ रहेंगी!
यक़ीनन कोई तो है रक़ीब मेरा
जो हरगिज़ नहीं चाहता की ये नज़्में तुम तक पहुँचे!
वरना कोई सूरज की आग जलाने की जद्दोजहद में क्यों जुटता भला?
जल्दी करो...
ये कागज़ अब जल जाएगा...
ये नज़्में झुलस झुलस कर मिट जाएंगी...
बड़ी नाजुक हैं
ये चाँद के क़लम और तारों की सियाही से रात के कागज़ पे लिखी मेरी नज़्में!

बस यूँही