Wednesday, 20 January 2016

तू बन के रात...

तू बन के रात, आ जा अभी मेरे सिरहाने…
न जाने कितनी और हैं बातेँ, जो दिनभर तुमसे कही नहीं !

Monday, 28 December 2015

ख़ुद से वफ़ादारी...

कभी ख़ुद से भी बना कर देख लो ज़रा सी दूरियाँ
हमेशा ख़ुद की ख़ुद से वफ़ादारी ज़रूरी नहीं होती !

Friday, 25 December 2015

मेरी नाजुक नज़्में

चाँद को तराश कर बड़ी मेहनत से
एक क़लम बनाई है मैंने
और जला कर तारों को
बनाई है ये सियाही
सोचता हूँ के कुछ नज़्में लिख के जाऊँ
रात के कागज़ पे आज!
तुम बस इतना करना कि अपनी आँखों की अलमारी जल्दी से खोल कर 
उठा कर इन सारी नज़्मों को
बंद कर लेना उस अलमारी में
महफूज़ रहेंगी!
यक़ीनन कोई तो है रक़ीब मेरा
जो हरगिज़ नहीं चाहता की ये नज़्में तुम तक पहुँचे!
वरना कोई सूरज की आग जलाने की जद्दोजहद में क्यों जुटता भला?
जल्दी करो...
ये कागज़ अब जल जाएगा...
ये नज़्में झुलस झुलस कर मिट जाएंगी...
बड़ी नाजुक हैं
ये चाँद के क़लम और तारों की सियाही से रात के कागज़ पे लिखी मेरी नज़्में!

Wednesday, 23 December 2015

साँस

मेरे हक़ की, मेरे हिस्से की साँस
अपनी राह बनाते बनाते
ग़ैरों से चेहरा छुपाते छुपाते
मेरी तरफ़ आती है...
मेरी बन जाती है...
कितना दर्द उठाती है !
साँस निकलती होगी बेचारी की !

Wednesday, 17 December 2014

यादें

हम दूर उनसे नहीं भागते...
हम भागते हैं उन यादों से, जिनकी शक्लो-सूरत उनसे मिलती है!

वो पहली मुलाक़ात, जो ख़ुदा की मर्ज़ी से हुई…
फिर वो सिलसिला, जो शुरू हुआ ख़ुद की मर्ज़ी से!

वो चेहरा, जो दवा हुआ करता हमारे हर एक दर्द की...
वो हंसी, जो मरहम हुआ करती दिल के हर एक ज़ख्म का...
वो आवाज़, जो इलाज हुआ करती हमारे हर एक मर्ज़ का...
वो अल्फाज़, जो ताक़त हुआ करते हमारे टूटते बिखरते हौसले की…
वो अंदाज़, जो वजह हुआ करते हमारे चैनोसुकूँ की…
छुपते हैं अब हम उन तमाम यादों से, जिन में शामिल ये सभी हैं!

वो सुबहें सभी जो थी कभी रोशन उन्ही से...
वो शामें भी जो थामे रहतीं हाथ उन्ही का.…
वो रातें, जो ओढ़ कर आतीं उन्हीं के ज़ुल्फ़ के साये...
वो हर एक पल जो था कभी गुलशन उन्ही से...
वो सभी लम्हे जिन पे हक़ था सिर्फ उन का
बचते हैं अब हम उन तमाम यादों से, जिन में शामिल ये सभी हैं !

वो सपने,जो देखे हक़ीक़त से अंजान रहकर
वो क़समें, जो खाईं नादान जज्बातों में बहकर
वो वादे, किये जो कभी बिना सोचे बिना समझे
वो इरादे, रखे जो कभी बिना जाने बिना बूझे
वो सारी खुशियां ख़ुद की जो उन पे लुटा दी...
वो सारे आँसू उनके जो इन आँखों से बहे
वो सारे लफ्ज़ जो उनके लिए कहे
जो उनसे सुने, अपने लिए!
डरते हैं अब हम उन तमाम यादों से, जिन में शामिल ये सभी हैं !

यादें... जिन में सब कुछ उन्ही का
अक्स भी... शक्ल भी... आवाज़ भी... अंदाज़ भी...
और हाँ, हम भी !

आख़िर ये यादें ही तो हैं जो हर दम याद दिलाती हैं…
की कभी इंसान हुआ करते थे हम!
डर लगता है अब इंसान बनने से!

बस यूँही