शब्दोंसे परे भावोंसे भरे
Saturday, 19 November 2016
फ़ासले
आजकल कुछ लिख नहीं पा रहा हूँ...
तुझसे फ़ासले बढ़ रहे हैं शायद...
"ऐ ज़िन्दगी, गले लगा ले!"
Newer Posts
Older Posts
Home
Subscribe to:
Comments (Atom)
बस यूँही
देखा है मैंने
देखा है मैंने साथी बादलों से घिरे चाँद को चोरी से मेरी तरफ देख मुस्कुराते हुए ! हाँ; देखा है मैंने | और ये जानने के बाद की मैं भ...
पलकों के तले
ख़्वाबों को हक़ीक़त का जामा हर बार नहीं पहनाया जाता कुछ ख़्वाब सिर्फ पलकों के तले महफूज़ रहते हैं पलकें खुली नहीं की पिघल गए हमेशा के लि...
काफ़िर ही सही
बैठा था चिंतन में डूबा नदिया के तट पे अकेला हाँ... अकेला ही शायद! तभी अचानक नजरें उठीं ऊपर उस अनादि अनंत आसमान में देख गगन में होती अविरत...