शब्दोंसे परे भावोंसे भरे
Friday, 30 November 2012
मुमकिन नहीं
उसने कहा
भूल जाओ
भूल जाओ मुझे सदा के लिए
मैंने कहा
मुमकिन नहीं
न तो मैं ख़ुद को भुला सकता हूँ
न ही ख़ुदा को
Newer Posts
Older Posts
Home
Subscribe to:
Comments (Atom)
बस यूँही
देखा है मैंने
देखा है मैंने साथी बादलों से घिरे चाँद को चोरी से मेरी तरफ देख मुस्कुराते हुए ! हाँ; देखा है मैंने | और ये जानने के बाद की मैं भ...
पलकों के तले
ख़्वाबों को हक़ीक़त का जामा हर बार नहीं पहनाया जाता कुछ ख़्वाब सिर्फ पलकों के तले महफूज़ रहते हैं पलकें खुली नहीं की पिघल गए हमेशा के लि...
काफ़िर ही सही
बैठा था चिंतन में डूबा नदिया के तट पे अकेला हाँ... अकेला ही शायद! तभी अचानक नजरें उठीं ऊपर उस अनादि अनंत आसमान में देख गगन में होती अविरत...